सीयूईटी परिणाम आने के आसपास हर साल एक ही सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है — “पासिंग मार्क्स कितने हैं?” सच यह है कि यह सवाल ख़ुद ही ग़लत आधार पर बना है। सीयूईटी में एनटीए किसी तय प्रतिशत या न्यूनतम अंक को “पासिंग मार्क्स” के तौर पर घोषित नहीं करता। जो असल में मायने रखता है, वह है हर विश्वविद्यालय की अपनी अलग कटऑफ़ — और वह परिणाम घोषित होने के बाद, अलग-अलग चरणों में जारी होती है। यह समझ लेने से आधी उलझन वहीं ख़त्म हो जाती है।
पाँच बातें जो पहले समझ लीजिए
- कोई एक फ़िक्स पासिंग मार्क्स नहीं है: एनटीए जनरल, ओबीसी, एससी, एसटी के लिए कोई तय न्यूनतम प्रतिशत घोषित नहीं करता।
- कटऑफ़ विश्वविद्यालय तय करते हैं: डीयू, जेएनयू, बीएचयू जैसे हर केंद्रीय विश्वविद्यालय की अपनी अलग कटऑफ़ होती है।
- कोर्स के हिसाब से बदलती है: एक ही विश्वविद्यालय में अलग-अलग कोर्स की कटऑफ़ अलग-अलग होती है।
- रिज़ल्ट के बाद आती है: कटऑफ़ एनटीए के स्कोरकार्ड जारी होने के बाद, विश्वविद्यालयों की अपनी काउंसलिंग प्रक्रिया में आती है।
- स्कोर और कटऑफ़ अलग चीज़ें हैं: आपका स्कोर एनटीए देता है; उस स्कोर से प्रवेश मिलेगा या नहीं, यह विश्वविद्यालय की कटऑफ़ तय करती है।
सीयूईटी में पास होने की धारणा ग़लत क्यों है
स्कूल की बोर्ड परीक्षा में एक तय प्रतिशत — जैसे 33% — लाने पर पास माना जाता है। छात्र सीयूईटी को भी उसी तरह देखते हैं, और यहीं ग़लतफ़हमी शुरू होती है। सीयूईटी असल में स्कूल जैसी “पास-फ़ेल” परीक्षा नहीं, बल्कि एक रैंकिंग परीक्षा है — जैसे बाक़ी प्रवेश परीक्षाएँ।
- स्कोरकार्ड में सिर्फ़ अंक होते हैं: एनटीए आपको हर विषय में मिले अंक और सामान्यीकृत (normalised) स्कोर देता है — पास या फ़ेल का कोई लेबल नहीं।
- तुलना अपने-आप होती है: आपका स्कोर दूसरे लाखों छात्रों के स्कोर के सापेक्ष मायने रखता है, किसी तय सीमा के सापेक्ष नहीं।
- बहु-विषय परीक्षा: छात्र अलग-अलग विषय चुनते हैं, इसलिए एक समान पासिंग मार्क्स की बात वैसे भी व्यावहारिक नहीं है।
- सोशल मीडिया के दावे अक्सर ग़लत होते हैं: “जनरल के लिए 45%, ओबीसी के लिए 40%” जैसे आँकड़े हर साल घूमते हैं, पर इनका कोई आधिकारिक स्रोत नहीं होता।
- असली सवाल कटऑफ़ का है: जो पूछना चाहिए वह यह है — “मुझे जो कोर्स चाहिए, उसकी पिछले साल की कटऑफ़ क्या थी?” एक और बात याद रखिए — एनटीए आपको सीधा “प्रतिशत” नहीं, अंक और सामान्यीकृत (normalised) स्कोर देता है, और पर्सेंटाइल की भी बात होती है, जो बताता है कि आप कितने प्रतिशत छात्रों से आगे हैं। प्रतिशत और पर्सेंटाइल अलग-अलग चीज़ें हैं, इन्हें मिलाइए मत।
इसलिए स्कोरकार्ड आने पर घबराने या राहत महसूस करने से पहले यह याद रखिए — अकेला स्कोर कुछ तय नहीं करता। असली फ़ैसला अगले चरण में होता है।
कटऑफ़ असल में कौन तय करता है
सीयूईटी के तहत आने वाला हर केंद्रीय या राज्य विश्वविद्यालय अपनी सीटें, अपनी माँग और पिछले रुझान देखकर अपनी कटऑफ़ ख़ुद तय करता है। यही वजह है कि एक ही स्कोर लेकर एक छात्र को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में प्रवेश मिल सकता है, और उतने ही स्कोर पर दूसरे कॉलेज में नहीं।
- विश्वविद्यालय स्तर पर: डीयू, बीएचयू, जेएनयू, अंबेडकर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान अपनी वेबसाइट पर अलग से कटऑफ़ जारी करते हैं — जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में पूरी प्रवेश और कटऑफ़ प्रक्रिया उसके अपने CSAS (Common Seat Allocation System) पोर्टल से होती है।
- कॉलेज स्तर पर: बड़े विश्वविद्यालयों में हर कॉलेज और हर कोर्स की कटऑफ़ अलग हो सकती है।
- सीटों की संख्या पर निर्भर: जिस कोर्स में सीटें कम और माँग ज़्यादा हो, वहाँ कटऑफ़ ऊँची चली जाती है।
- हर साल बदलती है: पिछले साल की कटऑफ़ सिर्फ़ अंदाज़ा देती है, गारंटी नहीं — पेपर के स्तर और आवेदकों की संख्या से यह ऊपर-नीचे होती रहती है।
- आरक्षण नियम अलग से लागू होते हैं: ओबीसी, एससी, एसटी, ईडब्ल्यूएस और दिव्यांग वर्गों के लिए आरक्षण नियम केंद्र सरकार और संबंधित विश्वविद्यालय की नीति से तय होते हैं, सीयूईटी स्कोर से अलग।
इसलिए “पासिंग मार्क्स” खोजने के बजाय, अपने लक्षित विश्वविद्यालय और कोर्स की पिछले साल की कटऑफ़ सूची खोजिए — यही आपको असली तस्वीर देगी।
कटऑफ़ कब और कहाँ जारी होती है
एनटीए का काम रिज़ल्ट और स्कोरकार्ड जारी करने पर ख़त्म हो जाता है। कटऑफ़ और काउंसलिंग की पूरी प्रक्रिया इसके बाद विश्वविद्यालयों के हाथ में चली जाती है, और यह चरण अलग-अलग संस्थानों में अलग समय पर शुरू होता है।
- पहला चरण — स्कोरकार्ड: एनटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर सभी अभ्यर्थियों का स्कोरकार्ड जारी होता है।
- दूसरा चरण — काउंसलिंग पंजीकरण: हर विश्वविद्यालय अपनी अलग काउंसलिंग या प्रवेश पोर्टल खोलता है, जहाँ स्कोरकार्ड अपलोड करना होता है।
- तीसरा चरण — कटऑफ़ या मेरिट लिस्ट: पंजीकरण बंद होने के बाद विश्वविद्यालय अपनी पहली कटऑफ़ या मेरिट लिस्ट जारी करता है।
- चौथा चरण — कई राउंड: ज़्यादातर विश्वविद्यालयों में एक से ज़्यादा राउंड होते हैं; खाली सीटों के हिसाब से कटऑफ़ अगले राउंड में ऊपर-नीचे हो सकती है।
- स्रोत हमेशा आधिकारिक रखिए: कटऑफ़ और तारीख़ों के लिए विश्वविद्यालय की अपनी वेबसाइट देखिए, किसी फ़ॉरवर्ड किए गए मैसेज या पुराने आर्टिकल पर भरोसा मत कीजिए।
इसका मतलब है कि रिज़ल्ट आने के दिन ही “मुझे प्रवेश मिलेगा या नहीं” का जवाब नहीं मिलता — यह जवाब कई हफ़्तों में, चरणों में आता है। यह जानकर धैर्य रखना आसान हो जाता है।
कटऑफ़ के इंतज़ार में क्या करना चाहिए
कटऑफ़ आने में जो समय लगता है, उसे बेकार गँवाने के बजाय आगे की तैयारी में लगाया जा सकता है। नीचे दिए काम इस इंतज़ार को उपयोगी बना देते हैं।
- पिछले वर्षों की कटऑफ़ इकट्ठा कीजिए: जिन विश्वविद्यालयों और कोर्स में दिलचस्पी है, उनकी पिछले दो-तीन साल की कटऑफ़ लिस्ट बना लीजिए — रुझान समझने में मदद मिलेगी।
- दस्तावेज़ पहले से तैयार रखिए: मार्कशीट, प्रमाणपत्र, फ़ोटो और पहचान पत्र की स्कैन कॉपी अभी से एक फ़ोल्डर में रख लीजिए — जाति/श्रेणी प्रमाणपत्र और ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र भी साथ रखिए, क्योंकि समय पर यह न होने से सीट हाथ से निकल जाती है।
- कई विकल्प खुले रखिए: सिर्फ़ एक कॉलेज पर निर्भर न रहकर तीन-चार विश्वविद्यालयों और कोर्स की सूची बनाइए।
- काउंसलिंग की समय-सीमा पर नज़र रखिए: हर विश्वविद्यालय की पंजीकरण तारीख़ अलग होती है; इन्हें कैलेंडर में नोट कर लीजिए।
- घबराकर फ़ैसला मत लीजिए: पहले राउंड में मनचाहा कॉलेज न मिलने का मतलब मौक़ा ख़त्म होना नहीं है — अगले राउंड में कटऑफ़ अक्सर नीचे आती है।
सबसे ज़रूरी बात — जब तक विश्वविद्यालय की आधिकारिक कटऑफ़ सूची सामने न आए, तब तक किसी अनुमानित प्रतिशत के आधार पर बड़ा फ़ैसला मत लीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या सीयूईटी के लिए कोई फ़िक्स पासिंग मार्क्स है?
नहीं। एनटीए किसी श्रेणी के लिए कोई तय न्यूनतम प्रतिशत घोषित नहीं करता। “जनरल के लिए 45%” जैसे आँकड़े सोशल मीडिया पर घूमते ज़रूर हैं, पर इनका कोई आधिकारिक आधार नहीं है — इन्हें नज़रअंदाज़ कीजिए।
कटऑफ़ कहाँ देखनी चाहिए?
जिस विश्वविद्यालय में प्रवेश लेना है, उसकी अपनी आधिकारिक वेबसाइट या काउंसलिंग पोर्टल पर। हर विश्वविद्यालय अपनी कटऑफ़ अपने समय पर, अपने पोर्टल पर जारी करता है — किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट को अंतिम स्रोत मत मानिए।
अगर स्कोर उम्मीद से कम आए तो?
घबराने की ज़रूरत नहीं। बहुत से विश्वविद्यालयों और कोर्स की कटऑफ़ हर राउंड में बदलती है, और कुछ संस्थानों में मौक़ा दूसरे या तीसरे राउंड में भी मिलता है। अपने विकल्प खुले रखिए और सिर्फ़ एक कॉलेज पर निर्भर मत रहिए।
सामान्यीकृत (normalised) स्कोर का क्या मतलब है?
चूँकि सीयूईटी कई पालियों (shifts) में होती है और हर पाली का पेपर थोड़ा अलग होता है, इसलिए अंकों को एक समान पैमाने पर लाने के लिए सामान्यीकरण किया जाता है। इससे किसी पाली के पेपर के कठिन या आसान होने का असर अंकों पर बराबर हो जाता है।
सीयूईटी में असली सवाल पासिंग मार्क्स नहीं, कटऑफ़ है — और कटऑफ़ का जवाब सिर्फ़ आपके विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर मिलेगा।
