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मॉडरेशन, ग्रेस मार्क्स और ग्रेडिंग: आपके अंक कैसे तय होते हैं

मॉडरेशन, ग्रेस मार्क्स और ग्रेडिंग

रिजल्ट आने के बाद सबसे ज़्यादा उलझन तीन शब्दों को लेकर होती है — मॉडरेशन, ग्रेस मार्क्स और ग्रेडिंग। दोस्तों की बातचीत में ये तीनों एक ही चीज़ मान लिए जाते हैं, जबकि तीनों अलग हैं और तीनों का असर आपकी मार्कशीट पर अलग तरह से पड़ता है। एक बार यह समझ लेने के बाद न तो झूठी उम्मीद बनती है और न ही बेवजह घबराहट।

एक नज़र में तीनों का फ़र्क़

  • मॉडरेशन: प्रश्नपत्र के कठिन या त्रुटिपूर्ण होने पर पूरे समूह के अंकों में किया गया संतुलन — यह किसी एक छात्र के लिए नहीं होता।
  • ग्रेस मार्क्स: पास होने से थोड़े-से अंक पीछे रह गए छात्र को दी गई छूट — यह व्यक्तिगत होती है।
  • ग्रेडिंग: अंक मिल जाने के बाद उन्हें A1 से लेकर E तक के ग्रेड में बदलने की प्रक्रिया।
  • आवेदन की ज़रूरत नहीं: ये तीनों काम बोर्ड परिणाम बनाते समय ख़ुद करता है; छात्र को अलग से कोई फ़ॉर्म नहीं भरना होता।
  • पास का पैमाना अलग है: हर विषय में तय न्यूनतम प्रतिशत लाना ज़रूरी होता है, जो आमतौर पर 33% रहता है।

मॉडरेशन क्या है और क्यों किया जाता है

हर साल एक ही विषय के कई सेट में प्रश्नपत्र बनते हैं, और यह मुमकिन है कि एक सेट दूसरे से थोड़ा कठिन निकल जाए। ऐसे में जिस छात्र को कठिन सेट मिला, उसे नुक़सान न हो — यही सोचकर बोर्ड अंकों में संतुलन करता है। इसी प्रक्रिया को मॉडरेशन कहते हैं।

  • यह समूह के लिए होता है: मॉडरेशन किसी एक छात्र को देखकर नहीं, पूरे सेट या पूरे विषय को देखकर तय किया जाता है।
  • कठिनाई का अंतर: अगर किसी सेट में औसत अंक बाक़ी सेटों से काफ़ी कम रहें, तो उस अंतर को पाटा जाता है।
  • त्रुटिपूर्ण प्रश्न: अगर कोई प्रश्न ग़लत या भ्रामक पाया जाए, तो उसका लाभ सभी छात्रों को समान रूप से दिया जाता है।
  • मूल्यांकन में एकरूपता: अलग-अलग परीक्षकों की सख़्ती में फ़र्क़ न रह जाए, इसका ध्यान भी इसी चरण में रखा जाता है।
  • यह पास कराने का ज़रिया नहीं है: मॉडरेशन का मक़सद निष्पक्षता है, किसी को पास कराना नहीं।

इसीलिए यह मान लेना ग़लत है कि “मॉडरेशन से सबके अंक बढ़ जाएँगे”। कुछ वर्षों में यह असर दिखता ही नहीं, क्योंकि सभी सेट लगभग बराबर कठिनाई के होते हैं। बोर्ड इस बारे में जो नीति लागू करता है, वह समय-समय पर बदलती रही है, इसलिए अंतिम जानकारी सीबीएसई की आधिकारिक वेबसाइट से ही लीजिए।

ग्रेस मार्क्स किसे और कैसे मिलते हैं

ग्रेस मार्क्स का मक़सद बिलकुल अलग है। यह उस छात्र के लिए है जो पास होने से बहुत थोड़े अंक पीछे रह गया — जैसे 33 चाहिए थे और 31 आए। ऐसे मामलों में बोर्ड कुछ अंक जोड़कर उसे पास कर देता है, ताकि दो-तीन अंक की वजह से पूरा साल न चला जाए।

  • सीमा तय होती है: आमतौर पर एक विषय में अधिकतम पाँच अंक तक की छूट दी जाती है, इससे ज़्यादा नहीं।
  • सिर्फ़ नज़दीक वालों को: जो छात्र पास अंक से काफ़ी पीछे है, उसे इसका लाभ नहीं मिलता।
  • थ्योरी पर लागू: यह छूट आमतौर पर लिखित परीक्षा के अंकों पर दी जाती है, प्रैक्टिकल या आंतरिक मूल्यांकन पर नहीं।
  • अपने आप लागू होती है: इसके लिए कोई आवेदन नहीं करना पड़ता; परिणाम बनाते समय बोर्ड ख़ुद इसे लागू करता है।
  • सीबीएसई की मार्कशीट पर अलग नहीं दिखता: प्रमाणपत्र पर अंतिम अंक ही छपते हैं। कुछ राज्य बोर्डों में ऐसे विषय के आगे तारांकन या अलग संकेत लगाने का चलन रहा है, इसलिए अपने बोर्ड का नियम देख लीजिए।

इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप पास अंक से एक-दो अंक पीछे हैं, तो परिणाम में पहले ही यह छूट जुड़ चुकी होती है। यानी मार्कशीट पर जो लिखा है, वही अंतिम स्थिति है — उसके बाद और छूट माँगने का कोई रास्ता नहीं होता।

ग्रेड कैसे तय होता है

यहीं सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी पैदा होती है। ज़्यादातर छात्र मानते हैं कि 91 अंक आए तो A1 पक्का है। असल में बोर्ड की ग्रेडिंग तुलनात्मक होती है — यानी आपका ग्रेड सिर्फ़ आपके अंकों से नहीं, बल्कि उस विषय में बाक़ी छात्रों के प्रदर्शन से भी तय होता है।

  • नौ बिंदुओं का पैमाना: ग्रेड A1 से शुरू होकर E तक जाते हैं, जिनमें A1 सबसे ऊपर होता है।
  • क्रम के आधार पर बँटवारा: उस विषय में पास हुए सभी छात्रों को अंकों के क्रम में लगाया जाता है; ऊपर के आठवें हिस्से को A1, अगले आठवें हिस्से को A2, और इसी तरह आगे।
  • बड़ी संख्या पर लागू: यह तरीक़ा तभी अपनाया जाता है जब उस विषय में पास होने वाले छात्र काफ़ी बड़ी संख्या में हों।
  • हर साल अंतर आ सकता है: जिस अंक पर इस साल A1 मिला, अगले साल उसी अंक पर A2 मिल सकता है।
  • विषय के हिसाब से भी अंतर: दो अलग विषयों में बराबर अंक होने पर भी ग्रेड अलग हो सकते हैं।

इसीलिए ग्रेड को अपनी मेहनत की माप मत मानिए। ग्रेड बताता है कि उस साल उस विषय में आप कहाँ खड़े थे, यह नहीं कि आपने कितना सीखा। कॉलेज में दाख़िले के समय भी ज़्यादातर जगह प्रतिशत देखा जाता है, ग्रेड नहीं।

प्रतिशत कैसे निकाला जाता है

यहाँ एक पुरानी जानकारी अब भी घूमती रहती है — “सीजीपीए को 9.5 से गुणा कर दो”। वह तरीक़ा उस दौर का था जब कक्षा 10 का परिणाम ग्रेड पॉइंट औसत के रूप में आता था। वह व्यवस्था अब कक्षा 10 में लागू नहीं है; मार्कशीट पर अब विषयवार अंक और ग्रेड दोनों दिए जाते हैं। इसलिए 9.5 वाला गुणा आज के छात्र पर लागू मत कीजिए।

  • बोर्ड कुल प्रतिशत नहीं छापता: मार्कशीट पर विषयवार अंक होते हैं; कोई एक “कुल प्रतिशत” या डिवीज़न बोर्ड की ओर से नहीं लिखा जाता।
  • प्रतिशत आप निकालते हैं: जितने विषय गिनने हैं उनके अंक जोड़िए, कुल पूर्णांक से भाग दीजिए और सौ से गुणा कर दीजिए।
  • बेस्ट ऑफ़ फ़ाइव का चलन: कई स्कूल और कॉलेज सबसे अच्छे पाँच विषयों के अंक लेकर प्रतिशत निकालते हैं — पर यह बोर्ड का नियम नहीं, संस्थानों का चलन है।
  • हर जगह तरीक़ा एक नहीं: किसी कॉलेज में पाँच विषय गिने जाते हैं, किसी में सभी विषय; फ़ॉर्म भरने से पहले उसकी शर्त पढ़ लीजिए।
  • पुराने नतीजों पर लागू: अगर आपकी मार्कशीट उस पुराने दौर की है जिस पर सीजीपीए छपा है, तभी 9.5 वाला अनुमान काम आता है।

इसलिए जब भी किसी फ़ॉर्म में प्रतिशत माँगा जाए, अंदाज़ा लगाने के बजाय मार्कशीट के अंकों से ख़ुद जोड़कर निकालिए और यह देख लीजिए कि उस संस्थान ने कौन-से विषय गिनने को कहा है। यही एक सावधानी बाद में होने वाली सबसे आम गड़बड़ी रोक देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मॉडरेशन और ग्रेस मार्क्स एक ही चीज़ हैं?

नहीं। मॉडरेशन पूरे समूह पर लागू होता है और उसका मक़सद प्रश्नपत्रों की कठिनाई का अंतर पाटना है। ग्रेस मार्क्स एक-एक छात्र पर लागू होते हैं और उनका मक़सद पास होने से थोड़ा पीछे रह गए छात्र को मदद देना है।

क्या ग्रेस मार्क्स के लिए आवेदन करना पड़ता है?

नहीं। परिणाम तैयार करते समय बोर्ड यह छूट ख़ुद लागू करता है। इसीलिए मार्कशीट पर जो अंक दिख रहे हैं, वे छूट जुड़ने के बाद वाले अंतिम अंक होते हैं।

मेरे अंक ज़्यादा हैं फिर भी ग्रेड कम क्यों है?

क्योंकि ग्रेड तुलनात्मक होता है। अगर उस साल उस विषय में बहुत से छात्रों के अंक ऊँचे रहे, तो ऊपर के हिस्से में जगह बनाना कठिन हो जाता है और उन्हीं अंकों पर नीचे वाला ग्रेड मिल सकता है।

क्या मार्कशीट पर सीजीपीए मिलेगा?

कक्षा 10 की मौजूदा मार्कशीट पर विषयवार अंक और ग्रेड दिए जाते हैं, सीजीपीए नहीं। सीजीपीए वाली व्यवस्था पुराने दौर की थी। इसलिए 9.5 से गुणा करने वाला तरीक़ा आज की मार्कशीट पर लागू नहीं होता — प्रतिशत अंकों से ही निकालिए।

नतीजा चाहे जैसा हो, ये तीनों प्रक्रियाएँ आपकी मेहनत को निष्पक्ष तरीक़े से आँकने के लिए बनी हैं — अंक कैसे बने यह समझ लेना अगली बार की रणनीति तय कर देता है।

Written & reviewed by Team Principal Saab — Meet the team →